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"It was a wonderful experience interacting with you and appreciate the way you have planned and executed the whole publication process within the agreed timelines.”
Subrat SaurabhAuthor of Kuch Woh Palनर्मदा की निर्मल एवं पावन धाराओं से अभिसिंचित मध्य प्रदेश की पुण्यभूमि नर्मदापुरम में जन्मी श्रीमती गोस्वामी ज्योति गिरि वह व्यक्तित्व हैं, जिनका संपूर्ण जीवन शिक्षा, समाजसेवा और नारी-सशक्तिकरण के ऊँचे आदर्शों को समर्पित रहा Read More...
नर्मदा की निर्मल एवं पावन धाराओं से अभिसिंचित मध्य प्रदेश की पुण्यभूमि नर्मदापुरम में जन्मी श्रीमती गोस्वामी ज्योति गिरि वह व्यक्तित्व हैं, जिनका संपूर्ण जीवन शिक्षा, समाजसेवा और नारी-सशक्तिकरण के ऊँचे आदर्शों को समर्पित रहा है। बाल्यावस्था से ही उनके व्यक्तित्व में तेज, करुणा और अदम्य कर्मठता का जो समन्वय दिखाई देता था, उसने आगे चलकर उन्हें समाज की दिशा को आलोकित करने वाली एक प्रेरणास्रोत शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया।
पुश्तैनी भाटों की वाणी से ज्ञात होता है कि उनके पूर्वजों की मूलभूमि तीर्थराज पुष्कर रही—वही पावन स्थल जहाँ सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने यज्ञ संपन्न किया। कालांतर में उनका पुनर्वास नर्मदापुरम में हुआ, और इसी सांस्कृतिक प्रवाह ने ज्योति गिरि के व्यक्तित्व को दो समृद्ध परंपराओं—राजस्थानी गौरव और मध्य प्रदेश की लोकसहजता—का अद्वितीय संगम बना दिया। उनके आचार-विचार, वेशभूषा और जीवनशैली में इन दोनों संस्कृतियों की छाप स्वाभाविक रूप से दृष्टिगोचर होती है।
जीवन के नवोदय में उन्होंने गोस्वामी विक्रम गिरि के साथ परिणय सूत्र में बंधकर केवल गृहस्थ-धर्म का आदर्श पालन ही नहीं किया, बल्कि दशनाम गोस्वामी समाज की सामाजिक चेतना से स्वयं को गहन रूप से जोड़ा। इसी पवित्र संयोग ने उनके जीवन को एक नई दिशा प्रदान की—जहाँ परिवार के साथ-साथ समाज को भी प्रकाशमान करने का संकल्प दिनों-दिन प्रबल होता गया।
अनेक सामाजिक संगठनों से जुड़े रहते हुए वे विशेषतः नारी-सशक्तिकरण, शिक्षा एवं सांस्कृतिक जागरण के क्षेत्र में सक्रिय हैं और आज भी सकारात्मक परिवर्तन की एक सतत वाहिका के रूप में समर्पितभाव से कार्यरत हैं।
शिक्षा:
स्नातक (कंप्यूटर विज्ञान)
स्नातक (हिंदी)
स्नातक (शिक्षा शास्त्र)
स्नातकोत्तर (हिंदी साहित्य)
Born in the sacred land of Narmadapuram in Madhya Pradesh, sanctified by the pure and timeless waters of the revered Narmada, Mrs. Goswami Jyoti Giri is a personality whose life has been devoted to the noble ideals of education, social service, and women’s empowerment. From an early age, her character reflected a rare synthesis of brilliance, compassion, and indomitable dedication—qualities that gradually established her as a guiding force and an inspiring presence within society.
According to the traditional genealogical accounts preserved by ancestral bards, her forefathers trace their origins to the holy land of Pushkar—the revered Tirtharaj where Lord Brahma is believed to have performed the primordial yajna. In later generations, the family resettled in Narmadapuram, and this historical journey bestowed upon her personality a unique confluence of two rich cultural streams—the regal heritage of Rajasthan and the grounded simplicity of Madhya Pradesh. Their harmonious imprint is naturally reflected in her values, demeanor, attire, and way of life.
In the early dawn of her life’s journey, she entered into matrimony with Goswami Vikram Giri, embracing not only the sacred responsibilities of the Grihastha Ashrama but also aligning herself deeply with the social and spiritual consciousness of the Dashnam Goswami community. This sacred union gave her life renewed direction—strengthening her resolve to illuminate not only her family sphere but the broader community as well.
Actively associated with various social organizations, she remains especially dedicated to the causes of women’s empowerment, education, and cultural awakening. Even today, she continues to serve as a steadfast channel of positive transformation, working with commitment, dignity, and an unwavering sense of purpose.
Education:
Bachelor’s Degree in Computer Science
Bachelor’s Degree in Hindi
Bachelor’s Degree in Education (B.Ed.)
Master’s Degree in Hindi Literature
आधुनिकता की चकाचौंध और पश्चिमी प्रभावों के प्रबल प्रवाह में दशनाम गोस्वामी समाज की गौरवशाली परंपराएँ धुंधली पड़ती प्रतीत हो रही हैं। यह केवल समय का परिवर्तन नहीं, बल्कि हमारी
आधुनिकता की चकाचौंध और पश्चिमी प्रभावों के प्रबल प्रवाह में दशनाम गोस्वामी समाज की गौरवशाली परंपराएँ धुंधली पड़ती प्रतीत हो रही हैं। यह केवल समय का परिवर्तन नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक अस्मिता और आध्यात्मिक चेतना के लिए गंभीर संकेत है। यदि जड़ों से संबंध टूट जाए, तो वटवृक्ष की छाया भी टिक नहीं पाती। इसी संवेदना और उत्तरदायित्व-बोध से प्रेरित यह ग्रंथ रचा गया है। यह पुस्तक केवल अतीत की घटनाओं का वर्णन नहीं करती। इसका उद्देश्य युवा पीढ़ी को उनके गौरवशाली इतिहास और महान परंपराओं से परिचित कराना है। यह उन्हें उनके आध्यात्मिक उत्तराधिकार, शास्त्रों पर आधारित जीवन-मूल्यों और गुरु-शिष्य परंपरा की गरिमा को समझने के लिए प्रेरित करती है। साथ ही, यह अद्वैत की उज्ज्वल जीवन-दृष्टि से उन्हें पुनः जोड़ने का प्रयास है, ताकि वे अपने समाज और संस्कृति पर गर्व महसूस करें। यह कृति एक आह्वान है अपने मूल की ओर लौटने का, अपने कर्तव्य को पहचानने का, और उस तेजस्वी सांस्कृतिक ज्योति को पुनः प्रज्वलित करने का, जिसने सदियों तक धर्म और ज्ञान को आलोकित किया। विश्वास है, यह पुस्तक नई पीढ़ी में स्वाभिमान, समर्पण और जागरण की प्रखर चेतना जगाएगी।
आधुनिकता की चकाचौंध और पश्चिमी प्रभावों के प्रबल प्रवाह में दशनाम गोस्वामी समाज की गौरवशाली परंपराएँ धुंधली पड़ती प्रतीत हो रही हैं। यह केवल समय का परिवर्तन नहीं, बल्कि हमारी
आधुनिकता की चकाचौंध और पश्चिमी प्रभावों के प्रबल प्रवाह में दशनाम गोस्वामी समाज की गौरवशाली परंपराएँ धुंधली पड़ती प्रतीत हो रही हैं। यह केवल समय का परिवर्तन नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक अस्मिता और आध्यात्मिक चेतना के लिए गंभीर संकेत है। यदि जड़ों से संबंध टूट जाए, तो वटवृक्ष की छाया भी टिक नहीं पाती। इसी संवेदना और उत्तरदायित्व-बोध से प्रेरित यह ग्रंथ रचा गया है। यह पुस्तक केवल अतीत की घटनाओं का वर्णन नहीं करती। इसका उद्देश्य युवा पीढ़ी को उनके गौरवशाली इतिहास और महान परंपराओं से परिचित कराना है। यह उन्हें उनके आध्यात्मिक उत्तराधिकार, शास्त्रों पर आधारित जीवन-मूल्यों और गुरु-शिष्य परंपरा की गरिमा को समझने के लिए प्रेरित करती है। साथ ही, यह अद्वैत की उज्ज्वल जीवन-दृष्टि से उन्हें पुनः जोड़ने का प्रयास है, ताकि वे अपने समाज और संस्कृति पर गर्व महसूस करें। यह कृति एक आह्वान है अपने मूल की ओर लौटने का, अपने कर्तव्य को पहचानने का, और उस तेजस्वी सांस्कृतिक ज्योति को पुनः प्रज्वलित करने का, जिसने सदियों तक धर्म और ज्ञान को आलोकित किया। विश्वास है, यह पुस्तक नई पीढ़ी में स्वाभिमान, समर्पण और जागरण की प्रखर चेतना जगाएगी।
पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति की ओर बढ़ते कदमों के साथ, आदिगृहस्थ दशनामी ब्राह्मण समाज अपनी पवित्र परंपराओ से दूर होता जा रहा है। यह एक चिंताजनक और दुखद परिदृश्य है, जो हमारी संस्क
पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति की ओर बढ़ते कदमों के साथ, आदिगृहस्थ दशनामी ब्राह्मण समाज अपनी पवित्र परंपराओ से दूर होता जा रहा है। यह एक चिंताजनक और दुखद परिदृश्य है, जो हमारी संस्कृति और धर्म की जड़ों को कमजोर कर रही है। इस पुस्तक के माध्यम से, हमने आदिगृहस्थ दशनामी ब्राह्मण समाज के युवाओं को उनकी विरासत, मूल्यों, और परंपराओं के बारे में जागरूक करने का प्रयास किया हैं। हमारा लक्ष्य है कि युवा वर्ग अपने समाज के लिए एक सकारात्मक योगदान करें, और हमारी संस्कृति की जड़ों को मजबूत बनाएं।
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