भारत विश्व के सबसे समृद्ध स्मारक-संपदा वाले देशों में से एक है । पाँच हज़ार वर्षों से अधिक की सभ्यता के मंदिर, किले, मस्जिदें, मकबरे और पुरातात्विक स्थल यहाँ बिखरे पड़े हैं। परंतु इनमें से अनेक आज गंभीर खतरे में हैं।
"भारतीय स्मारकों का संरक्षण" एक सुलभ और व्यापक पुस्तक है जो भारत की निर्मित विरासत की पहचान, सुरक्षा और जीर्णोद्धार की प्रक्रिया, इसके सिद्धांतों, संगठनों और तकनीकों को सरल हिंदी में प्रस्तुत करती है।
पुस्तक में विरासत संरक्षण के अंतर्राष्ट्रीय आधारभूत चार्टर्स : वेनिस चार्टर (1964), बुर्रा चार्टर, प्रामाणिकता पर नारा दस्तावेज़ और दिल्ली घोषणा (2023), का परिचय दिया गया है। ASI का इतिहास, संरक्षण नीति और हालिया "विरासत गोद लें 2.0" जैसी पहलों की जानकारी दी गई है। असुरक्षित स्मारकों की रक्षा में INTACH की भूमिका पर भी प्रकाश डाला गया है। साथ ही नागर, द्रविड़, कलिंग और मुगल स्थापत्य शैलियों का वह ज्ञान दिया गया है जो किसी भी स्मारक में हस्तक्षेप से पहले आवश्यक है।
पुस्तक आधुनिक चुनौतियों को भी संबोधित करती है: 3D लेजर स्कैनिंग, LiDAR, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वर्चुअल रियलिटी जैसी डिजिटल तकनीकों का संरक्षण में बढ़ता उपयोग; जलवायु परिवर्तन से तटीय मंदिरों, रेगिस्तानी किलों और प्राचीन पत्थर संरचनाओं पर बढ़ता खतरा; और कंबोडिया के ता प्रोह्म तथा वियतनाम के चाम मंदिरों में ASI का अंतर्राष्ट्रीय संरक्षण कार्य।
भारत भर से लिए गए उदाहरण: हुमायूँ का मकबरा, तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर, बोधगया का महाबोधि मंदिर, नागार्जुनकोंडा का बौद्ध परिसर और लोथल का सिंधु घाटी स्थल, इस पुस्तक को व्यावहारिक धरातल पर ले जाते हैं।
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