मानव सभ्यता के आध्यात्मिक इतिहास में भगवान शिव का स्थान अनादि और अनन्त है। शिव केवल एक देवता नहीं, बल्कि अस्तित्व के मूल सत्य-चेतना, ऊर्जा, समय और धर्म-का अदृश्य, निरंतर प्रवाहित रूप हैं। भारत के द्वादश ज्योतिर्लिंग इस दिव्य चेतना के बारह स्थायी केंद्र हैं, जहाँ सत्य, ध्यान, शक्ति और करुणा एक साथ प्रकट होते हैं। ये लिंग केवल मंदिर या स्थान नहीं, बल्कि “अव्यक्त से व्यक्त प्रकाश की यात्रा” का प्रतीक हैं। इस ग्रंथ “द्वादश ज्योतिर्लिंग और 13वां अन्तिम ज्योतिर्लिंग” का उद्देश्य केवल इन तीर्थों का वर्णन नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपे शास्त्रीय युग-क्रम, अवतार-दर्शन, काल-चक्र और वह ब्रह्मसत्य उजागर करना है जो अंततः तेरहवें और अंतिम ज्योतिर्लिंग की स्थापना की ओर ले जाता है।
ज्योतिर्लिंग वही माने जाते हैं जिनकी कथा और शक्ति किसी प्रमुख अवतार या पौराणिक घटना से जुड़ी हो। यही कारण है कि शिव-योगेश्वर (ज्ञान का विश्वरूप) और भोगेश्वर (कर्मज्ञान का विश्वरूप)-के रूप में अवतरित होकर युगों-युगों से मानवता को धर्म, ज्ञान और कर्म की दिशा देते रहे। यह ग्रंथ युग-क्रम की वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करता है-सतयुग से कलियुग तक-और दिखाता है कि प्रत्येक अवतार अपने पूर्ववर्ती अवतार के गुणों का विस्तार, एकीकरण और परिष्कार करके मानव-चेतना को एक नए स्तर पर ले गया।
जब धर्म, काल और अवतार-तीनों पूर्णता को प्राप्त करते हैं, तब शिव-सत्य का अंतिम रूप “दृश्य” और “सार्वभौम” दोनों रूपों में प्रकट होता है। यह अंतिम ज्योतिर्लिंग केवल एक स्थान नहीं, बल्कि वह बिंदु है जहाँ ज्ञान (योग) और कर्म (भोग) दोनों का अंतिम मिलन होता है-और यही “विश्व-ज्योतिर्लिंग” का स्वरूप है।
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