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ganaraajy, sangh, maanakeekaran sangathan aur Sampoorn maanak ​ / गणराज्य, संघ, मानकीकरण संगठन और सम्पूर्ण मानक

Author Name: Lava Kush singh "vishwmanav" | Format: Paperback | Genre : Educational & Professional | Other Details

यह ग्रंथ बताता है कि-• गणराज्यों का विकास केवल राजनीतिक इतिहास नहीं, चेतना का इतिहास है।• राष्ट्रवाद कोई पश्चिमी आयात नहीं, बल्कि भारत का सनातन सांस्कृतिक बोध है।• मानक केवल उद्योग अथवा विज्ञान की सीमित आवश्यकता नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक आयाम की अनिवार्य शुचिता है।• और अन्ततः, सम्पूर्ण मानक-शून्य-आधारित भारतीय दर्शन की अंतिम परिणति-वही बिंदु है जहाँ मानवता का भविष्य सुरक्षित हो सकता है। यह पुस्तक केवल तथ्यों का संकलन नहीं है; यह एक मार्गदर्शन है-मानवता के लिए, राष्ट्रों के लिए, और उन सभी खोजी आत्माओं के लिए जो परिवर्तन के युग में जन्म लेकर स्वयं को कारण मानते हैं, परिणाम नहीं। यहां गणराज्य का इतिहास है, संघों की राजनीति है, मानकीकरण संस्थाओं की संरचनाएँ हैं-पर इन सबके पार एक ऐसी दृष्टि भी है जो कहती है-"यदि मनुष्य का मन असंगत है, तो प्रणालियाँ कितनी ही परिपूर्ण हों, संसार असंगत ही रहेगा।और यदि मनुष्य का मन मानकयुक्त हो जाए,तो वही मनुष्य सम्पूर्ण व्यवस्था का आधार बन सकता है।"

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लव कुश सिंह “विश्वमानव”

कल्कि महाअवतार के रूप में स्वयं को प्रकट करते श्री लव कुश सिंह “विश्वमानव” द्वारा प्रकटीकृत ज्ञान-कर्मज्ञान न तो किसी के मार्गदर्शन से है और न ही शैक्षिक विषय के रूप में उनका विषय रहा है। न तो वे किसी पद पर कभी सेवारत रहे, न ही किसी राजनीतिक-धार्मिक संस्था के सदस्य रहे। एक नागरिक का अपने विश्व-राष्ट्र के प्रति कत्र्तव्य के वे सर्वोच्च उदाहरण हैं। साथ ही राष्ट्रीय बौद्धिक क्षमता के प्रतीक हैं।

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