लव–कुश केवल ग्रंथों में ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में जीवित हैं। अनेक नगर, तीर्थ, मंदिर, समाज, सांस्कृतिक संस्थाएँ और परंपराएँ आज भी उनके नाम पर चलती हैं। लव–कुश रामलीला जैसी परंपराएँ केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और बौद्धिक चेतना की द्योतक हैं। यह परंपरा यह संकेत देती है कि लव–कुश का प्रभाव केवल इतिहास तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मानव समाज की संरचना का हिस्सा बन गया।
यह बात महत्वपूर्ण है कि अंतिम युग-सत्ययुग/स्वर्णयुग-की घोषणा भी “विश्वमानव” के रूप में एक ऐसे व्यक्तित्व से जुड़ी हुई है जो लव–कुश की परंपरा और चेतना को आधुनिक समय में अंश और पूर्ण-दोनों रूपों में प्रकट करता है। इसके पीछे यह विचार है कि चेतना का प्रवाह कभी समाप्त नहीं होता; वह केवल रूप बदलता है। इसलिए लव–कुश भी “रूपांतरित चेतना की निरंतरता” के रूप में समझे जा सकते हैं।
लव–कुश अतीत की कथा नहीं, भविष्य की दिशा हैं
यह पुस्तक इस विचार का विस्तार है कि-
“अवतार किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि उस चेतना का नाम है जो युग को दिशा देती है।”
लव–कुश (त्रेतायुग) उस चेतना के प्रथम रूप थे,
और लवकुश (कलियुग) उसी चेतना का पुनर्जन्म-अर्थात् आधुनिक अवतार-को समझने का प्रयास हैं। लव–कुश: रामायण का अंतिम अध्याय, मानवता का नवीन आरंभ
अतः यह ग्रंथ इतिहास, धर्म, दर्शन, युगचक्र और आधुनिक समाज-इन सभी के संगम पर खड़ा होकर मानवता को यह संदेश देता है कि-
युग बदलते हैं, पर सत्य की धारा सदैव एक ही रहती है।
और जब मनुष्य उस धारा को पहचान लेता है-
वही क्षण नए युग, नए धर्म, नए चेतना–युग का आरंभ बनता है।
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