मानवता का इतिहास जितना बाहरी संघर्षों का वृत्तांत है, उतना ही भीतर चल रही एक अदृश्य यात्रा का भी साक्षी है-चेतना की यात्रा। सभ्यताएँ टूटती हैं, साम्राज्य उठते और गिरते हैं, राजनीतिक प्रणालियाँ बदलती हैं, मगर मनुष्य के भीतर एक ऐसी ज्योति है जो हर युग में, हर परिवर्तन के साथ, और अधिक प्रखर होकर जलने लगती है। आज मानवता जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां बाहरी दुनिया की भीड़ से ज्यादा शोर उस भीतर उठती हुई पुकार का है, जो समय-समय पर महापुरुषों, बुद्धों, ऋषियों और साधकों के रूप में प्रकट होती रही है।उसी कालजयी पुकार का अगला स्वर है - मैत्रेय बुद्ध। यह ग्रंथ-"मैत्रेय बुद्ध की ओर"-सिर्फ एक पुस्तक नहीं, बल्कि बदलती हुई पृथ्वी का एक आध्यात्मिक-दस्तावेज है। यह भविष्य के मनुष्य, भविष्य के धर्म और भविष्य की विश्व-व्यवस्था का वह दृष्टिपत्र है जिसे हर जागरूक मानव को पढ़ना ही नहीं, जीना भी पड़ेगा।मनुष्य ने हजारों वर्षों से बाहरी अवतारों की प्रतीक्षा की।लेकिन यह पुस्तक कहती है-मैत्रेय बाहर नहीं आएगा।तुम्हारे भीतर उठेगा।प्रतीक्षा समाप्त हुई।यात्रा शुरू हुई।यह पुस्तक उसी यात्रा की पहली सीढ़ी है-एक ऐसी यात्रा जिसमें मनुष्य स्वयं अपना बुद्ध बनता है,और मानवता स्वयं अपना मैत्रेय।