मनुष्य के अंदर होने वाले सूक्ष्म परिवर्तन जब एक निश्चित सीमा तक पहुँचते हैं, तब वे समाज, राष्ट्र और अंततः पूरे विश्व को बदल देते हैं। इतिहास के हर मोड़ पर यह नियम कार्य करता रहा है-चाहे वह एक नए धर्म का उदय हो, नई राजनीतिक व्यवस्था का जन्म हो, या विज्ञान की किसी क्रांति ने दुनिया की दिशा बदल दी हो। आज मानवता एक ऐसे ही निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। दस्तावेज़ स्पष्ट करता है कि सृजन और विनाश के चक्र-शारीरिक, आर्थिक और मानसिक-अब केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि विश्व-स्तर पर दिखाई देने लगे हैं। यह संकेत है कि पृथ्वी की वर्तमान व्यवस्था, उसकी राजनीति, अर्थव्यवस्था, धर्म, शिक्षा और मनोविज्ञान-सभी अपने अंतिम विकास-चरण पर पहुँच रहे हैं। ऐसे समय में एक प्रश्न पूरे विश्व-मानव के सामने खड़ा होता है:क्या वर्तमान विश्व व्यवस्था आगे बढ़ सकती है, या अब एक नई व्यवस्था जन्म लेने वाली है? दस्तावेज़ इस परिवर्तन का आधार "मानकीकरण" को मानता है। आज हर राष्ट्र आर्थिक उत्पादों, व्यापार, तकनीकी मानकों, फोन नेटवर्क, डेटा प्रबंधन-सब कुछ वैश्विक मानकों पर चला रहा है। परंतु मानव-समाज, मन, विचार, धर्म, राजनीति और शिक्षा-इन पर कोई विश्व-मानक नहीं है। इसी विसंगति ने वर्तमान विश्व-व्यवस्था को अस्थिर और असंगत बनाया है। दस्तावेज़ कहता है कि मानकीकरण के कई स्तर हो सकते हैं-व्यक्ति, परिवार, ग्राम, जनपद, राज्य, राष्ट्र और विश्व-परंतु अंतिम स्तर हमेशा विश्व या ब्रह्माण्डीय होता है। उदाहरणस्वरूप:• भारत का आईएसआई• विश्व का ISO, IEC, ITUये संकेत देते हैं कि भविष्य की सभ्यता मानक-विहीन नहीं चल सकती। नया युग एक ऐसी विश्व-व्यवस्था का आह्वान कर रहा है