मनुष्य का जीवन केवल जन्म और मृत्यु के बीच का एक सफ़र भर नहीं है, बल्कि यह संघर्षों, सपनों और आत्मविश्वास की निरंतर यात्रा है। समाज में जब कोई बालक निर्धनता और अभावों के बीच पलता है, तब उसकी नियति अक्सर दूसरों द्वारा पहले से लिखी हुई प्रतीत होती है—मजदूरी, बेबसी और टूटे हुए सपनों की नियति किन्तु वही बालक यदि अपनी परिस्थितियों से जूझते हुए हार मानने के बजाय उठ खड़ा हो, तो वह केवल अपनी तकदीर ही नहीं बदलता, बल्कि अपने पूरे समाज के लिए आशा और प्रेरणा का दीप बन जाता है।
यह पुस्तक "नियति – एक तयशुदा संघर्ष" एक ऐसे ही बालक अशोक (परिवर्तित नाम) की जीवन-यात्रा है, जिसने झुग्गियों और ग़रीबी की अंधेरी गलियों से निकलकर अपने संघर्ष को हथियार बनाया और समाज के सामने यह सिद्ध किया कि ग़रीबी नियति नहीं, बल्कि एक अस्थायी चुनौती है।
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