यह ग्रंथ परिवर्तन - काल, मनु, युग, व्यास और शास्त्र मानव-चेतना के सूक्ष्म और दीर्घकालिक परिवर्तन के उस अंतर्संबंध को विस्तृत रूप में उद्घाटित करता है जहाँ इतिहास केवल बाहरी घटनाओं का क्रम नहीं रह जाता, बल्कि आंतरिक परिपक्वता, धार्मिक-सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और शास्त्रीय पुनरावृत्ति का ही परिणाम बन जाता है; यहाँ हर युग का अपना मनु, अपना व्यास और अपना शास्त्र होता है क्योंकि प्रत्येक युग की आवश्यकताओं के अनुरूप सत्य की अभिव्यक्ति भी रूपान्तरित होती है। ग्रंथ यह प्रतिपादित करता है कि विष्णु-तत्व का अव्यक्त रूप-एकात्म प्रेम-और उसका व्यक्त रूप-एकात्म कर्म-आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़े हैं; जब कोई मानव समभाव के साथ आत्म-हित में कर्म करता है तब वही कर्म विष्णु का अवतार प्रस्फुटित करता है, अतः अवतार को किसी ऐतिहासिक व्यक्ति या इवेंट तक सीमित नहीं देखा जा सकता, वह चेतना के एक ऐसे प्रवाह का नाम है जो "एकात्मध्यान" और "एकात्मकर्म" में पूर्ण होता है। दस्तावेज़ शास्त्रीय सूत्रों, सांख्यिकीय पद्धति और उपनिषदियों की संहिताओं को साम्यबद्ध करते हुए दिखाता है कि युग-चक्र का सिद्धांत केवल कालक्रम का वर्णन नहीं करता बल्कि मनोवैज्ञानिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक मानचित्र भी प्रस्तुत करता है-यही कारण है कि शास्त्र बार-बार नए रूप धारण करते हैं और व्यास-परम्परा नए युग की भाषा बनकर सृष्टि-प्रवाह में निरंतरता सुनिश्चित करती है। इस दृष्टि से परिवर्तन का अर्थ नकारात्मक विघटन नहीं, बल्कि भीतर के केन्द्र का पुनर्स्थापन और बाहरी व्यवस्था का अनुरूपन है; जिस प्रकार शरीर का अंग-समूह संतुलन खोए तो उसे पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता होती है