मानव सभ्यता की श्रृंखला तभी आगे बढ़ती है जब उसकी प्रथम कड़ी-अर्थात् मानव की बुनियादी चेतना-सही दिशा में विकसित हो। यदि हम केवल अंतिम या मध्य कड़ी को आगे बढ़ाएँ तो संघर्ष, प्रतियोगिता और असंतुलन ही उत्पन्न होते हैं। इसलिए इस ग्रंथ का उद्देश्य केवल विचारों का संकलन नहीं, बल्कि विचारों की दिशा-निर्धारण है-एक ऐसी दिशा जो आरम्भिक सत्य को जानकर अन्तिम दृष्टि की ओर ले जाती है।
“प्रारम्भिक सत्य – अन्तिम दृष्टि” केवल दार्शनिक विमर्श नहीं; यह आधुनिक मानव का बौद्धिक मानचित्र है-जहाँ विज्ञान और आध्यात्मिकता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक शक्तियाँ हैं। एक ऐसा युग भी उदित हो रहा है जिसमें एशिया की आध्यात्मिक चेतना और पश्चिम की वैज्ञानिक दृष्टि मिलकर मानव इतिहास का नये प्रकार का पृष्ठ लिख रही हैं। यह ग्रंथ उसी बदलते काल की दस्तक है-एक चेतावनी भी, और एक आह्वान भी।
यह कृति पाठक को आत्मा से ब्रह्माण्ड तक, व्यक्ति से विश्वमानव तक, और प्रारम्भिक सत्य से अन्तिम दृष्टि तक की यात्रा पर ले जाती है। यह केवल पढ़ने का नहीं-सोचने, समझने और भीतर रूपान्तरित होने का ग्रंथ है।
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