मानव सभ्यता का इतिहास यह बताता है कि समाज केवल मनुष्यों के समूह से नहीं बनता-वह उन विचारों, मान्यताओं, आदर्शों और लक्ष्यों से बनता है जिन्हें मनुष्य अपनी सामूहिक चेतना में स्थान देता है। जब विचार ऊँचे होते हैं, समाज उठता है; जब विचार गिरते हैं, समाज का पतन होता है। इसी सरल सत्य को व्यापक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि से समझाने का प्रयास इस पुस्तक “समाज और ईश्वरीय समाज” में किया गया है।
समाज निरंतर परिवर्तनशील है-शिकारी समाज से लेकर कृषि, औद्योगिक, उत्तर-औद्योगिक और आज के ज्ञान-समाज तक मानवीय यात्रा एक निरंतर खोज की यात्रा रही है । मनुष्य अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए विज्ञान और तकनीक का सहारा ले रहा है, और “पृथ्वी को स्वर्ग बना देने” के प्रयास में लगा है । किंतु समाज तभी पूर्ण बन सकता है जब उसकी प्रगति बाहरी ही नहीं, आंतरिक भी हो-जहाँ वैज्ञानिक चेतना के साथ आध्यात्मिक चेतना का संतुलन बना रहे, जैसा स्वामी विवेकानन्द कहते हैं कि दोनों का अभाव मानव अस्तित्व को संकट में डाल देता है ।
अंततः इस पुस्तक का संदेश अत्यंत स्पष्ट है- कि समाज को ईश्वरीय समाज की दिशा में ले जाने का मार्ग विज्ञान और वेदांत, व्यवस्था और नैतिकता, राजनीति और करुणा, तथा व्यक्तिगत विकास और सामूहिक चेतना के संतुलित संगम में निहित है।
जब मनुष्य स्वयं को, अपने समाज को और अपने विश्व को एक ही जीवन-चक्र का भाग समझेगा, तभी वह पृथ्वी के नागरिक से “विश्व-नागरिक” बनेगा-और वही ईश्वरीय समाज की पहली सीढ़ी है।
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