यह पुस्तक यह स्पष्ट करती है कि संत और गुरु केवल भारतीय अवधारणाएँ नहीं हैं; वे समस्त मानवता की साझा धरोहर हैं। यही कारण है कि बुद्ध, यीशु, लाओत्से, कृष्ण, गोरख, राम, नानक-सभी में एक ही चेतना प्रवाहित होती है। ओशो द्वारा अघोर को “सरलता और निर्दोषता” का मार्ग बताया जाना इस सार्वभौमिक संतत्व को ही दर्शाता है।
संत वह है जिसका अंतर “ओवरफ्लोइंग” हो जाए-जहाँ भीतर का आनंद बहकर विश्व का हो जाए। गुरु वह है जो ज्ञान नहीं देता, बल्कि ज्ञान प्राप्ति की दिशा दिखाता है-जैसा श्री अरविन्द कहते हैं कि शिक्षक “प्रशिक्षक नहीं, पथप्रदर्शक है” ।
दस्तावेज़ यह भी बताता है कि मानव-संस्कृति का अंतिम संकट स्वयं मनुष्य ने ही उत्पन्न किया-एक ऐसा संकट जिसे मनुष्यों को पता भी नहीं था कि वह पैदा हो चुका है। इसी संकट के समाधान को “अंतिम अवतार” का कार्य बताया गया है-वह अवतार जो “आदर्श वैश्विक व्यक्ति” के रूप में प्रकट होगा ।
यह पुस्तक केवल संतों की जीवनी नहीं,
केवल आध्यात्म का ग्रंथ भी नहीं,
और न ही केवल ज्ञान का संकलन है-
यह मानवता के अगले युग की रूपरेखा है।
यह वह ग्रंथ है
जहाँ विज्ञान और अध्यात्म एक होते हैं,
जहाँ मन का विज्ञान-मानक बन जाता है,
जहाँ संतत्व-वैश्विक मार्गदर्शन बन जाता है,
जहाँ भारत-विश्व गुरु की भूमिका ग्रहण करता है,
और जहाँ मनुष्य-सिर्फ नागरिक नहीं, बल्कि विश्व-नागरिक बनता है।
यह पुस्तक एक युग की उद्घोषणा है-
संतों का वैश्विक युग।
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