इस ग्रन्थ की विशेषता इसकी व्यापकता है-यह न केवल भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की गहराई से परिचित कराता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि संसार के सभी धर्म, मत, दार्शनिक परम्पराएँ और भविष्यदृष्टियाँ एक ही बिंदु पर जाकर मिलती हैं-सत्य की एकात्म अनुभूति। इसीलिए यह पुस्तक किसी विशेष धर्म की श्रेष्ठता नहीं, बल्कि सत्य धर्म की सर्वव्यापकता को प्रतिपादित करती है। यह बताती है कि आने वाला धर्म न तो विभाजन करेगा, न सीमाएँ खड़ी करेगा; वह मानवता को एक सूत्र में बाँधेगा। वह धर्म व्यवहारिक भी होगा, तत्त्वदर्शी भी, और ज्ञान-आधारित भी। यही वह धर्म है जिसे ऋषियों ने “ऋत”, योगियों ने “परम सत्य”, और वेद ने “सनातन धर्म” कहा है।
अंततः यह भूमिका पाठक को एक ही संदेश देती है-कि यह पुस्तक केवल ज्ञान नहीं देती, बल्कि दृष्टि देती है; केवल विचार नहीं देती, बल्कि अनुभूति जगाती है; केवल शास्त्रों की व्याख्या नहीं करती, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे सत्य को जगाती है। जो पाठक इस नए युग की चौखट पर खड़ा है, जो सत्य को केवल समझना नहीं बल्कि जीना चाहता है, उसके लिए यह ग्रन्थ दिशा, प्रेरणा और प्रकाश-तीनों के समान है। यह युग-परिवर्तन की घोषणा भी है और उसकी मार्गदर्शिका भी।
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