इस पुस्तक में विस्तार से बताया गया है कि युग परिवर्तन मात्र कोई दैवी घटना नहीं, बल्कि मानवीय चेतना का वैज्ञानिक और सुसंगत विकास है। जैसे-जैसे सभ्यताएँ वैश्विक होती गईं, मानकीकरण की आवश्यकता भी बढ़ती गई-मापन, व्यापार, भाषा, समय, तकनीक-सभी में एकरूपता की खोज मानवता के भविष्य की दिशा तय करती है। ठीक इसी प्रकार, विचारों और आध्यात्म का भी अपना एक मानक होना आवश्यक है, और वही “सत्य शास्त्र” का गूढ़ सार है।
यह पुस्तक प्राचीन और आधुनिक विश्वदृष्टि के बीच एक सेतु है। इसमें जहां एक ओर वेद–पुराणों की मूल संरचना का रहस्य उजागर होता है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक काल में शास्त्र की भूमिका, व्यास-परंपरा की निरंतरता, नवयुग के शास्त्र “विश्वशास्त्र” की आवश्यकता और युग–चक्र के अगली अवस्था-स्वर्णयुग-का परिचय मिलता है।
यह ग्रंथ उन सभी पाठकों के लिए लिखा गया है जो-
• सत्य की खोज में हैं,
• शास्त्रों को नये दृष्टिकोण से समझना चाहते हैं,
• युग-परिवर्तन को केवल भावनाओं में नहीं, बल्कि ज्ञान और तर्क में समझना चाहते हैं,
• और मानवता के अगले विकास-पायदान को पहचानना चाहते हैं।
मनुष्य तभी पूर्ण होता है जब उसका ज्ञान, उसका कर्म और उसकी चेतना एकाकार हो जाते हैं। इसी एकत्व की स्थापना-व्यक्ति में, समाज में और विश्व में-इस पुस्तक का अंतिम लक्ष्य है।
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