स्वामी विवेकानन्द का समूचा जीवन आत्मजागरण, शक्तिसंचार और मानवता के पुनर्निर्माण का आह्वान था।
इस ग्रंथ में ‘कल्कि’ कोई केवल दैवी या मिथकीय सैन्य-नायक नहीं, बल्कि युगानुसार सत्य का प्रवक्ता, अन्याय और अज्ञान के विनाश का प्रतीक तथा समाज के पुनर्गठन का द्रष्टा रूप में प्रकट होता है। ग्रंथ में वर्णित परंपरागत कथानक-जैसे कल्कि का शिष्य-परंपरा का निर्माण, अधर्माचारी शक्तियों का विनाश, तथा मायावी शक्तियों का उन्मूलन-इस बदलाव की आध्यात्मिक-सांस्कृतिक रूपक के रूप में उभरते हैं ।
स्वामी विवेकानन्द के विचार और कल्कि अवधारणा के बीच एक गहन सेतु दिखाई देता है-मनुष्य को उसकी सुप्त शक्ति का बोध कराना और युगधर्म के अनुरूप उसे नये आदर्श के लिए तैयार करना। विवेकानन्द ने कहा था कि प्रत्येक युग में धर्म की व्याख्या नयी होनी चाहिए; और जब-जब समाज जड़ता में फँसता है, तब एक नयी लहर आती है जो चेतना को झकझोर देती है। कल्कि इसी नवजागरण, उसी परिवर्तनशील शक्ति और उसी अंतिम सत्य-संघर्ष का प्रतीक बनते हैं।
यह पुस्तक-स्वामी विवेकानन्द के दृष्टिकोण और कल्कि अवतार के दार्शनिक-सांस्कृतिक अर्थ को जोड़कर-पाठक को यह समझाने का प्रयास करती है कि भविष्य का धर्म, भविष्य का मानव और भविष्य की सभ्यता कैसी होगी। “अवतार” यहाँ एक बाहरी हस्तक्षेप नहीं, बल्कि भीतर से उठने वाला वह प्रकाश है जो अंधकार के किसी भी युग को पार कर सकता है। विवेकानन्द का संदेश और कल्कि का आदर्श-दोनों मिलकर यह उद्घोष करते हैं कि मानवता का उत्थान मन के परिवर्तन से ही संभव है।
यह ग्रंथ उसी परिवर्तन के मार्ग को समझने, पहचानने और आत्मसात करने का निमंत्रण है।
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