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Vālmīki Rāmāyaṇa kī khādyasaṁskṛti / वाल्मिकी रामायण की खाद्यसंस्कृति महाकाव्य के समय की खाद्य विरासत की खोज/Mahākāvya ke samay kī khādya virāsat kī khoj

Author Name: Anil Dharmadhikari | Format: Paperback | Genre : Religion & Spirituality | Other Details

यह पुस्तक मूल वाल्मीकि रामायण में उल्लिखित खाद्य-पदार्थों और कृषि-प्रथाओं के मूल संदर्भों को प्रस्तुत करती है। अब तक अधिकतर चर्चा एक ही विषय के आस पास घूमती रही है—क्या श्रीराम मांसाहार करते थे? इस विषय पर पक्ष और विपक्ष में अनेक कथाएँ और तर्क प्रस्तुत किए जाते रहे हैं। परंतु यह पुस्तक रामायण में वर्णित खाद्य-सामग्रियों को समग्र दृष्टि से समझने का प्रयास करती है।

यह पुस्तक रामायणकालीन भोजन परंपराओं का विस्तार से परिचय कराती है—दैनिक आहार से लेकर अनुष्ठानों में प्रयुक्त विशिष्ट पदार्थों तक—और प्राचीन भारत की सांस्कृतिक व पाक-परंपराओं की एक रोचक झलक प्रस्तुत करती है, जहाँ दिव्य भोज, पवित्र संस्कार और वैभवपूर्ण दावतें देवताओं, राजाओं, ऋषियों और योद्धाओं के जीवन को आकार देती थीं।

इस पुस्तक में केवल मनुष्यों की ही नहीं, बल्कि राक्षसों और वानरों की खाद्य-आदतों का भी उल्लेख है, जो इस महाकाव्य के विविध पात्रों को समझने का एक अनूठा दृष्टिकोण प्रदान करता है।

राम के जन्म का कारण बने दिव्य पायसम से लेकर ऋषियों के भव्य उपहार-भोज तक, यह पुस्तक उस युग के भारत और लंका के स्वादों की सैर कराती है। रावण के निजी मदिरा-संग्रह की भव्यता, कुम्भकर्ण की असाधारण भूख, तथा सोम और पवित्र पेयों का आध्यात्मिक महत्व—सबका विस्तृत वर्णन इसमें मिलता है। फलों और सब्जियों से लेकर मांस, मछली, समुद्री आहार, मदिराओं और औषधीय पौधों तक—वाल्मीकि रामायण में उल्लिखित प्रत्येक खाद्य-संदर्भ को यह पुस्तक सुसंगत रूप से प्रस्तुत करती है।

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अनिल धर्माधिकारी

अनिल धर्माधिकारी एक लेखक, वक्ता और कॉर्पोरेट व्यवसायी हैं, जिन्हें खाद्य प्रसंस्करण, खाद्य सुरक्षा और विनियामक अनुपालन के क्षेत्र में पच्चीस से अधिक वर्षों का अनुभव है। उनके पास सीएफ़टी, परभणी से खाद्य विज्ञान में बी.टेक की डिग्री तथा प्रतिष्ठित भारतीय प्रबंधन संस्थान, कोझिकोड (आईआईएमके) से सार्वजनिक नीति प्रबंधन में प्रमाणपत्र प्राप्त है।

उन्हें उद्योग मानकों और विनियमों का गहन ज्ञान है, साथ ही कार्य के प्रति जुनून और दूरदर्शी सोच भी। वे अनेक सम्मेलनों में वक्ता और पैनल सदस्य के रूप में योगदान दे चुके हैं।

अपने व्यावसायिक कौशल के अतिरिक्त, अनिल भारतीय सभ्यता, इतिहास तथा रामायण और महाभारत जैसे प्राचीन महाकाव्यों से जुड़े विषयों के अध्ययन और विमर्श में विशेष रुचि रखते हैं। उनकी विविध रुचियाँ एवं व्यापक ज्ञान उन्हें एक विशिष्ट चिंतन-नेता बनाते हैं, जो तकनीकी विशेषज्ञता को भारत की सांस्कृतिक विरासत की गहरी समझ के साथ सुंदर रूप से जोड़ते हैं।

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