इस पत्रावली में शिक्षा-व्यवस्था का पुनर्गठन केवल पाठ्यक्रम का परिवर्तन नहीं, बल्कि मनुष्य-निर्माण का विज्ञान है-जहाँ प्राथमिक स्तर पर भाषा और सामान्य ज्ञान, माध्यमिक स्तर पर समाज-ज्ञान, हाई-स्कूल में सामान्यीकृत ज्ञान, इण्टरमीडिएट में कौशल-विकास और उच्च-शिक्षा में व्यक्तित्व की विशेषता को स्थान दिया गया है। यह क्रम इस विचार पर आधारित है कि नागरिक पहले "मनुष्य" बने, फिर "विशेषज्ञ"-और अंततः "उत्तरदायी विश्वमानव"। "अन्तिम पत्र" का स्वर केवल उपदेशात्मक नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप की गहन स्मृति का स्वर है-जहाँ मनुष्य को उसके भीतर छिपी उस दिव्यता की याद दिलाई जाती है जो समाजों का रूपांतर कर सकती है। यह वही बिंदु है जहाँ नागरिक-विकास, विश्वचेतना, शिक्षा-संरचना, समाज-नवनिर्माण और आध्यात्मिक विज्ञान एक होकर "विश्वमानव" की अवधारणा को मूर्त कर देते हैं। इस प्रकार यह पुस्तक आधुनिक भारत ही नहीं, उभरते हुए वैश्विक मनुष्य की कथा है-उस मनुष्य की, जो सीमाओं के भीतर जन्म लेता है, पर सीमाओं से परे सोचकर आगे बढ़ता है; जो राष्ट्र की जड़ों में खड़ा है, पर विश्व की शाखाओं में फैलता है; जो परम्परा का वाहक है,