भारतीय ग्रंथों में ‘शास्त्र’ केवल नीति या नियम नहीं, बल्कि सत्य की वह धारा है जिसे युगों–युगों तक प्रवाहित रखने का कार्य वेदव्यास ने किया। शास्त्र-लेखन केवल बौद्धिक लेखन न होकर एक ऐसी दिव्य प्रक्रिया है जिसमें ज्ञान का संपूर्ण प्रवाह मानव-चेतना के लिए संरक्षित किया जाता है। इसी कारण पुस्तक में “वेदव्यास शास्त्र-लेखन कला” को विशिष्ट स्थान दिया गया है-क्योंकि यही वह आधार है जिसके ऊपर “कल्कि महावतार” के महाग्रंथ को समझा जा सकता है।
इस ग्रंथ के केंद्र में स्थित विचार यह है कि जब मानव और प्रकृति दोनों किसी आवश्यक परिवर्तन को उत्पन्न करने में असफल हो जाते हैं, तब अन्तिम आत्मीय-बल सक्रिय होता है-वही बल जो युग-परिवर्तन का कारण बनता है।
शास्त्र-ग्रंथ का उद्देश्य पाठक को केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि उस अंतिम सत्य-दृष्टि तक ले जाना है जिसे समझे बिना न व्यास को समझा जा सकता है, न शास्त्रों को, और न ही कल्कि महावतार के वास्तविक अर्थ को। यह ग्रंथ मानव-चेतना, ब्रह्मांडीय व्यवस्था और युगधर्म-इन तीनों के संलयन का एक सार्वभौमिक प्रयास है।
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