भारत में लगभग 5 करोड़ मामले अदालतों में लंबित हैं। लाखों आम नागरिकों के लिए न्याय में देरी का अर्थ है — न्याय से वंचित होना।
एक संपत्ति विवाद जो उसे शुरू करने वाले व्यक्ति के जीवनकाल से भी लंबा खिंच जाए। एक विचाराधीन कैदी जो बिना दोष सिद्ध हुए वर्षों जेल में बिता दे। एक तलाक का मामला जो दोनों पक्षों की जिंदगी के सबसे अच्छे साल बर्बाद कर दे। ये भारतीय न्यायिक प्रणाली में अपवाद नहीं — रोज़मर्रा की सच्चाई हैं।
अदालती मामलों में देरी एक स्पष्ट, तथ्य-आधारित मार्गदर्शिका है जो देश की सबसे गंभीर लेकिन सबसे कम चर्चित समस्याओं में से एक को सरल भाषा में समझाती है — न्याय क्यों नहीं मिलता, किसे सबसे ज़्यादा नुकसान होता है, और असली सुधार कैसे दिखेगा।
इस पुस्तक में क्या है:
भारतीय अदालतें क्यों डूब रही हैं — और समस्या क्यों बढ़ती जा रही है
संपत्ति विवाद क्यों सबसे बड़ा और सबसे लंबा लंबित मामला बना हुआ है
क्यों भारत की 70% जेल आबादी ऐसे लोगों की है जिनका दोष अभी सिद्ध नहीं हुआ
पुलिस की निष्क्रियता, सरकारी मुकदमेबाजी और भ्रष्टाचार कैसे देरी को और बढ़ाते हैं
वादी किन तरीकों से जानबूझकर मामलों को लंबा खींचते हैं
जनहित याचिका — सामाजिक न्याय का हथियार — कैसे दुरुपयोग का शिकार बन रही है
AI, ई-कोर्ट और डिजिटल न्यायालय वास्तविकता में क्या बदल सकते हैं
भारतीय न्याय संहिता, मध्यस्थता अधिनियम 2023 और हाल के सुधारों की असली तस्वीर
सिंगापुर, ब्रिटेन और ब्राज़ील से भारत क्या सीख सकता है
व्यावहारिक सिफारिशें जिन्हें कोई भी गंभीर सरकार आज लागू कर सकती है
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