मनुष्य सभ्यता की समस्त आध्यात्मिक और दार्शनिक यात्रा का अंतिम लक्ष्य सदैव एक ही रहा है-समष्टि चेतना का जागरण, समाज का एकात्मकरण और सत्य-धर्म का विराट रूप। “भारत माता मन्दिर और विश्वधर्म मन्दिर” उसी यात्रा का आधुनिक रूपांतरण है, जो प्राचीन वेद, उपनिषद्, पुराण, महाभारत और विश्वशास्त्र के पाँच क्रमिक शास्त्रीय चरणों के आधार पर मानवता को पुनः एक सार्वभौमिक आत्मा की ओर ले जाने का प्रयास करता है-वेद जहाँ सार्वभौम आत्मा के ज्ञान द्वारा समाज को एक करता है, उपनिषद् जहाँ उस सत्य को नाम-रूप में बाँधकर स्थिरता देता है, पुराण जहाँ कृति-कथाओं द्वारा धर्म और लोकचेतना को जोड़ते हैं, महाभारत जहाँ प्रकृति और धर्म के संघर्ष को जीवन के यथार्थ में रखता है, और अंततः विश्वशास्त्र-“द नॉलेज ऑफ फाइनल नॉलेज”-जहाँ कर्मज्ञान, काल, चेतना और सार्वभौमिक सत्य को मिलाकर मानवता के लिए अंतिम मार्ग प्रस्तुत किया गया है । यह ग्रंथ धर्म को किसी एक मकान, संप्रदाय या आस्था की सीमाओं में नहीं बाँधता, बल्कि धर्म की उस मूल परिभाषा को पुनः प्रतिष्ठित करता है जिसमें धर्म का अर्थ मनुष्य को मनुष्य से, समाज को समाज से और विश्व को विश्व से जोड़ना है। यही कारण है कि पुस्तक धर्म और रिलिजन के अंतर को स्पष्ट करते हुए बताती है कि वास्तविक धर्म वह है जो सभी मतों और विचार परंपराओं को अपने भीतर समाहित कर सके, और इसी समावेशी दृष्टि से “विश्वधर्म” की अवधारणा जन्म लेती है, जिसमें विज्ञान, नैतिकता, दर्शन, परंपरा, योग और विवेक-सभी एक ही सत्यमूलक चेतना में अभिव्यक्त होते हैं ।
इस प्रकार “भारत माता मन्दिर और विश्वधर्म मन्दिर” केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक युग-दृष्टि है-
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