यह ग्रन्थ बताता है कि जैसे संसार बाहरी रूप से विकासवाद के नियमों के अधीन बदलता है, वैसे ही चेतना भी “विकासवाद और अवतारवाद” की एक आंतरिक यात्रा पूरी करती है। अवतार इस विकास की पराकाष्ठा हैं-जहाँ मनुष्य अपने भीतर उस दिव्यता को पहचानने लगता है, जो काल-काल में विभिन्न नामों और स्वरूपों में अवतरित होती रही है। कृष्ण उसी चेतना का एक प्रमुख बिंदु हैं-और “बुड्ढा कृष्ण” उसी बिंदु का अगला, व्यापक और सार्वभौमिक विस्तार।
विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि पुस्तक कृष्ण को एक “समाप्त अध्याय” नहीं, बल्कि एक विकसित सतत-अवतार चेतना के रूप में देखती है, जो आज के मनुष्य को विश्वमानव बनने की तैयारी कराती है। यहाँ शास्त्र केवल मान्यताएँ नहीं-वे चेतना-विज्ञान हैं; और कृष्ण केवल ऐतिहासिक देवता नहीं-वे अन्तिम एकात्म-सत्य के वाहक हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह ग्रन्थ केवल भक्ति नहीं, बल्कि दार्शनिक बुनियादों पर आधारित आध्यात्मिक विज्ञान है।
इस प्रकार “बुड्ढा कृष्ण – कृष्ण का भाग-दो और अन्तिम” केवल एक आध्यात्मिक पुस्तक नहीं, बल्कि-
• मन, ब्रह्मांड और ईश्वर की एकीकृत व्याख्या,
• अवतारवाद का आधुनिक पुनर्पाठ,
• चेतना-विकास का वैज्ञानिक विश्लेषण,
• और मानवता को आने वाले युग में प्रवेश कराती एक आध्यात्मिक पथ-रेखा है
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