इस पुस्तक की गहराई यह है कि यह धर्मों को एक मंच पर खड़ा करके तुलना नहीं करती, बल्कि यह दिखाती है कि सबके पीछे एक ही दिव्य इरादा काम कर रहा था। विश्व इतिहास में जितने भी धर्म स्थापित हुए-उनका मूल उद्देश्य मनुष्य को सत्य की ओर ले जाना था। परंतु समय के साथ धर्म ग्रंथ तो रह गए, पर सत्य की अनुभूति दुर्लभ हो गई। तब समय-समय पर ऋषि, पैग़म्बर, संत, मसीह, अवतार पृथ्वी पर आए। यह आवागमन ही मानवता का विकास-चक्र है। आज हम उसी चक्र के अंतिम बिन्दु पर खड़े हैं, जहाँ न केवल धर्मों की पूर्णता प्रकट होगी, बल्कि मनुष्य भी अपनी आंतरिक दिव्यता को पहचानने लगेगा। इस ग्रन्थ का आधार यह है कि अंतिम आगमन कोई अचानक घटना नहीं है-यह चेतना के स्तरों में क्रमिक परिवर्तन का परिणाम है। मनुष्य धीरे-धीरे अपने भीतर छिपे हुए ईश्वर को पहचानने लगा है। विज्ञान, दर्शन, मनोविज्ञान, अध्यात्म, ऊर्जा-चेतना, ब्रह्मांड-विज्ञान-सब एक नए प्रकार की एकता की ओर ले जा रहे हैं। जब मनुष्य समझने लगता है कि सृष्टि और ईश्वर अलग-अलग नहीं हैं, तब वह उस सत्य की ओर बढ़ता है जो अंतिम आगमन की आत्मा है।यह ग्रन्थ इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल भविष्य नहीं बताता-यह वर्तमान को स्पष्ट करता है। यह बताता है कि हम कहाँ खड़े हैं, किन कारणों से यहाँ पहुँचे हैं, और कहाँ जाने वाले हैं। यह न केवल धार्मिक या आध्यात्मिक पुस्तक है, बल्कि समय, इतिहास और चेतना का संयुक्त विज्ञान है। यहाँ शास्त्र केवल उद्धरण नहीं, बल्कि विश्लेषण हैं; धर्म केवल उपासना नहीं, बल्कि अनुभव हैं; और अवतार केवल श्रद्धा का विषय नहीं, बल्कि चेतना का रूप हैं।यह भूमिका उन सबका आमंत्रण है जो सत्य को जानना चाहते हैं, जो समय के अर्थ को समझना चाहते हैं,