इस पुस्तक के अंतिम अध्याय ईश्वर को धर्मों की सीमा से मुक्त कर देते हैं। वे बताते हैं कि ईश्वर का इतिहास उतना ही वैज्ञानिक है जितना आध्यात्मिक-क्योंकि चेतना का विकास किसी मत का विषय नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के नियमों का अनुसरण करता है। इस दृष्टि से, यह ग्रंथ आधुनिक मानव के लिए अत्यंत आवश्यक है-क्योंकि आज विज्ञान और धर्म दोनों अधूरे हैं। विज्ञान पदार्थ को समझता है, धर्म चेतना को; परंतु दोनों का मिलन तभी पूर्ण ज्ञान देता है। यही मिलन “ईश्वर का संक्षिप्त इतिहास” प्रस्तुत करता है-एक ऐसी भाषा में जो आधुनिक भी है, प्राचीन भी; वैज्ञानिक भी है, दार्शनिक भी; और गहन भी, किंतु पूर्णतः सुसंगत भी।
अंततः, यह पुस्तक एक आमंत्रण है-उन सभी के लिए जो अपनी आत्मा के इतिहास को जानना चाहते हैं। यह केवल ईश्वर के बारे में नहीं, बल्कि उस मनुष्य के बारे में है जो ईश्वर की ओर बढ़ रहा है। यह केवल परंपराओं का संकलन नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की चेतना और मानव के विकास का अद्वितीय संगम है। समय, युग, धर्म, प्रकृति, अवतार, ऊर्जा और चेतना-इन सभी का एकीकृत विज्ञान इस ग्रंथ में प्रत्यक्ष होता है।
और इसलिए, “ईश्वर का संक्षिप्त इतिहास” वास्तव में ईश्वर का नहीं-ईश्वर की ओर लौटते मनुष्य का इतिहास है।
एक ऐसा इतिहास जिसे समझने के बाद मनुष्य यह जान लेता है कि-
ईश्वर कहीं बाहर नहीं, वह स्वयं उसके भीतर ही प्रकट होने की प्रतीक्षा कर रहा है।
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