ग्रंथ की व्यापकता केवल सिद्धांतों तक नहीं, बल्कि व्यवहारिक प्रणालियों तक पहुँचती है-जिसमें ग्राम एवं नगर पंचायतों द्वारा प्रतिदिन के आँकड़े सीधे केंद्र तक पहुँचाने की व्यवस्था, स्थानीय भंडारण-प्रणाली, नागरिकों के लिए पारदर्शी प्रमाणपत्र प्रणाली, “अतिथि-देवो-भव” आधारित भोजन-गारंटी मॉडल, और कृषि से लेकर उद्योग तक प्रशासन का विकेंद्रीकृत तंत्र विस्तृत रूप से सामने आता है। यहाँ सब्सिडी केवल योग्य नागरिक तक, भ्रष्टाचार पर पूर्ण प्रतिबंध, तथा जिला-स्तर पर उद्योगों के विकास जैसी नीतियाँ “अधिकतम लाभ-न्यूनतम हानि” के सिद्धांत को व्यवहार में उतारती हैं ।
दार्शनिक स्तर पर ग्रंथ भारतीय और वैश्विक चिंतनों के बीच सेतु बनाता है। गांधी, विवेकानंद, भारतीय दर्शन और आधुनिक पश्चिमी चिंतन-सभी को पढ़ने के बाद यह निष्कर्ष निकलता है कि कोई भी धर्म या विचारधारा जो मनुष्य-मनुष्य के बीच भेद करे या विशेषाधिकार व शोषण का समर्थन करे, वह आज के मानव को स्वीकार्य नहीं हो सकता। आधुनिक मानव को वह धर्म चाहिए जो उसकी बुद्धि और आत्मा-दोनों का विकास करे; और यह भूमिका हिंदू धर्म, उसके शुद्ध स्वरूप में, विज्ञान और लोकतंत्र के अनुकूल रहते हुए निभा सकता है ।
अंततः, यह ग्रंथ व्यक्ति-निर्माण से शुरू होकर पूर्ण मानव निर्माण तक पहुँचता है-ऐसा मानव जो मानसिक, आध्यात्मिक, बौद्धिक और सामाजिक चारों स्तरों पर विकसित हो। “विश्वशास्त्र” के अनुसार यह पूर्ण मानव ही वह इकाई है जिससे समष्टि परिवर्तन होगा-ग्राम से देश, देश से विश्व, और विश्व से एक नई सभ्यता तक। इस दृष्टि से “कृति और विश्व-कृति” एक दार्शनिक ग्रंथ जो मानवता के पुनर्निर्माण का युगदर्शन है
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