ललकार समाज की उन चुप्पियों के खिलाफ़ एक सशक्त आवाज़
है, जो परंपरा, डर और दबाव के नाम पर इंसान को तोड़ देती हैं।
यह पुस्तक किसी एक वर्ग या लिंग को दोषी नहीं ठहराती, बल्कि
हर उस पीड़ा को सामने लाती है जो घरों, रिश्तों और सोच के
भीतर दबा दी जाती है।
ललकार प्रश्न पूछती है, चेतना जगाती है और आत्मसम्मान के साथ
जीने का साहस देती है।
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