आज का “विश्वभारत” उसी विचारधारा का पुनर्जन्म है, जहाँ महाभारत का धर्म आधुनिक विज्ञान, लोकतंत्र, वैश्विक समाज, आर्थिक नीतियों, शिक्षा, चरित्र निर्माण, नीति-विज्ञान और “विश्वशास्त्र” के माध्यम से एक व्यापक वैश्विक ढाँचा बनाता है। यह ग्रंथ बताता है कि जैसे प्राचीन भारत में धर्म का अर्थ समन्वय, सत्य, कर्तव्य, लोक-कल्याण और समाज-एकता था, वैसे ही आज विश्वसभ्यता को धर्म को फिर से “मानवता का विज्ञान” बनाना होगा, न कि केवल किसी संप्रदाय की सम्पत्ति। इसी से “विश्वभारत” की कल्पना जन्म लेती है - जहाँ महाभारत का “धर्मराज्य” आधुनिक युग में “व्यवस्था सत्यीकरण”, “मानव-केन्द्रित विज्ञान”, “राजऋषि परंपरा”, “नैतिक लोकतंत्र”, “शिक्षा-सुधार”, “मानव-एकता” और “वैश्विक नागरिकता” में बदल जाता है।
महाभारत ने मनुष्य को युद्ध के बीच भी धर्म चुनना सिखाया; विश्वभारत मनुष्य को विकास के बीच भी सत्य, कर्तव्य और वैश्विक कल्याण का पथ चुनना सिखाता है।
यह ग्रंथ एक नये विश्व-युग की घोषणा है - जहाँ भारत का आध्यात्मिक संदेश विश्व का सामाजिक, वैज्ञानिक और नैतिक मार्गदर्शन बन जाता है; जहाँ मानवता जाति, धर्म, राष्ट्र, वर्ग, भाषा, राजनीति और विचारों की सीमाओं से आगे बढ़कर एक “विश्व-समाज” बनाती है; और जहाँ मनुष्य स्वयं को केवल पृथ्वी का नागरिक नहीं, बल्कि “विश्वमानव” के रूप में पहचानता है। “महाभारत और विश्वभारत” इसलिए केवल अतीत की व्याख्या नहीं, बल्कि भविष्य की रचना है; यह धर्म का विस्तार नहीं, धर्म का पुनर्जन्म है; यह इतिहास का अध्ययन नहीं, इतिहास का अगला अध्याय है - वह अध्याय जिसमें महाभारत का धर्म, विश्व का धर्म बन जाता है, और भारत का आत्मदर्शन विश्वजगत का पथदर्शन।
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