पुस्तक बताता है कि भारतीय अवतार–परंपरा का उद्देश्य चमत्कारों का दर्शन कराना नहीं, बल्कि मानव–चेतना के उन चरणों का संकेत देना है जिनसे होकर समाज सभ्य रूप धारण करता है। इसी कड़ी में यह ग्रंथ विष्णु को ‘एकात्म–कर्म’ और लक्ष्मी को ‘एकात्म–प्रेम’ के अव्यक्त रूप के रूप में रखकर कर्म और प्रेम की परस्पर सह–सर्जनात्मक एकता का दार्शनिक प्रतिपादन करता है । यहाँ अवतार वह अद्भुत शक्ति नहीं है जो ईश्वर से पृथक खड़ी हो, बल्कि वह मन है जो कर्म और प्रेम की चरम एकता को शरीरधारी मनुष्य में व्यक्त कर सके। यही कारण है कि पुस्तक विकासवाद को भी अवतारवाद का पूरक मानता है-सृष्टि के क्रमिक विकास, तत्वों की उत्पत्ति, प्रकृति से पुरुष तक के उद्भव, और मनुष्य की चेतना में क्रमशः बढ़ती जटिलता को अवतारत्व के क्रमिक प्रस्फुटन के रूप में देखता है । इस दृष्टि से राम–रावण कथा केवल इतिहास या मिथक नहीं बल्कि मनुष्य के मन की यात्रा है-अज्ञान, अहंकार और विभाजन से निकलकर समभाव, धर्म और एकात्म की ओर बढ़ने की यात्रा।
इस प्रकार “राम, रावण और सार्वभौम एकात्म” केवल धार्मिक पुस्तक नहीं बल्कि मानव–विकास, युग–बोध, एकात्म–दर्शन और सार्वभौम मानव की अवधारणा का समन्वित ग्रंथ है। यह पाठक को परंपरा और आधुनिकता के बीच पुल बनाते हुए यह समझने में सहायता करता है कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को धर्म के संकीर्ण रूपों में बाँधना नहीं, बल्कि उसे एक ऐसी चेतना तक ले जाना है जहाँ वह पूरे विश्व को अपने भीतर समाहित अनुभव कर सके। यही ‘सार्वभौम एकात्म’ इस पुस्तक का मूल संदेश है-कि राम और रावण दोनों हमारे भीतर हैं, और उनके संघर्ष का अंतिम लक्ष्य किसी एक की हार या जीत नहीं बल्कि मनुष्य में स्थित दिव्यता का उदय है।
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