मानव इतिहास के पन्नों पर कुछ क्षण ऐसे अंकित होते हैं जब सभ्यता केवल बदलती नहीं, स्वयं को पुनः परिभाषित करती है। ऐसे समय में परिवर्तन बाहरी नहीं, भीतरी होता है-मनुष्यता अपने ही भीतर एक नयी चेतना, नयी दृष्टि और नयी दिशा को जन्म देती है। वर्तमान युग ऐसा ही एक संक्रमणकाल है। पुरानी व्यवस्थाएँ थक चुकी हैं, आधुनिक सभ्यता अपनी सीमाओं के चारों कोनों से चटक रही है, और मनुष्य का मन तेज़ी से एक नए प्रश्न की ओर उन्मुख हो रहा है-“मानवता का अगला कदम क्या है?”
इसी युग–संधि में प्रस्तुत यह ग्रंथ-“सम्पूर्ण क्रान्ति: अन्तिम कार्य योजना”-केवल घटनाओं का विश्लेषण नहीं, बल्कि मानवता के अगले विकास–चरण का ब्रह्माण्डीय मार्गदर्शन है। यह पुस्तक किसी एक विचारधारा का प्रचार नहीं करती; यह उन सभी विचारधाराओं का संयोग है जो मनुष्य को उसकी संकुचित चेतना से उठाकर विश्व–चेतना की ओर ले जाती हैं।
यह पुस्तक किसके लिए है?
यह पुस्तक-
• नेता के लिए मार्गदर्शक
• नागरिक के लिए ज्ञान–शास्त्र
• विद्वानों के लिए संदर्भ–ग्रंथ
• और मानवता के लिए भविष्य–दृष्टि
सभी रूपों में एक जीवित दस्तावेज़ है।
अंतिम संदेश:
इस ग्रंथ का सार एक वाक्य में संक्षेपित किया जा सकता है-
“सम्पूर्ण क्रान्ति तब शुरू होती है जब मनुष्य स्वयं बदलने के लिए तैयार हो।”
यह पुस्तक उसी परिवर्तन की अंतिम रूपरेखा है-
वह रूपरेखा जो मानवता को अगले हजार वर्षों तक दिशा प्रदान करेगी।
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