मनुष्य का इतिहास केवल युद्धों, साम्राज्यों और राजाओं की कहानी नहीं है; यह उस अदृश्य यात्रा का इतिहास भी है जिसमें मनुष्य लगातार यह जानने का प्रयास करता रहा है कि वह कौन है, क्यों है, कहाँ से आया है और किस दिशा में जा रहा है। सभ्यता की प्रत्येक उपलब्धि-विज्ञान, कला, संस्कृति, शासन, राजनीति, अर्थशास्त्र, आध्यात्म-इन सभी के पीछे मनुष्य की इसी सत्य–अन्वेषण यात्रा का हाथ रहा है। किंतु समय के साथ यह यात्रा दो भागों में बँट गई-एक वह जो बाहरी संसार को जीतने और सुधारने के लिए विज्ञान, तकनीक और भौतिक उपक्रमों की ओर बढ़ी; और दूसरी वह जो अंतरतम की गहराइयों में उतरकर मन के, आत्मा के और चेतना के रहस्यों को समझने के लिए ध्यान, योग और अध्यात्म की ओर प्रवृत्त हुई। यह द्वंद्व जितना पुराना है, उतना ही आधुनिक भी। यही कारण है कि आज का मनुष्य अत्यधिक उन्नत भौतिक दुनिया में रहते हुए भी किसी गहरी अधूरी खोज से पीड़ित दिखाई देता है-मानो उसके भीतर का मनुष्य अब भी कुछ ऐसा खोज रहा है जो उसे संसार के किसी भी बाज़ार में नहीं मिलता। इसी अधूरी खोज का समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास “सत्य शास्त्र और विश्वशास्त्र” करता है। यह ग्रंथ मनुष्य के समस्त विकास को-व्यक्तिगत, सामाजिक, राष्ट्रीय और वैश्विक-एक ही सूत्र में समझकर बताता है कि सत्य की खोज और समाज का निर्माण तब तक अधूरा है जब तक उसका आधार मन के सही मानक, विश्वमानक और मानवता के एकात्म ध्येय से न जुड़ जाए।
अंत में यह पुस्तक मानव सभ्यता के उस अगले चरण की चर्चा करती है जिसे “अंतिम शास्त्र”-The Knowledge of Final Knowledge-कहा गया है। यह अंतिम शास्त्र किसी नए धर्म की घोषणा नहीं है; यह किसी पंथ, किसी देवता, किसी जाति या किसी राष्ट्र की श्रेष्ठता नहीं गाता।
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