सत्यकाशी – स्वर्णयुग का तीर्थ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि उस विराट दृष्टि का उद्घोष है जो मानवता को विभाजन, संघर्ष और अज्ञान के युग से उठाकर एक ऐसे विश्व की ओर ले जाने का संकल्प करती है जहाँ धर्म, विज्ञान, समाज और चेतना-चारों मिलकर एक ही सार्वभौमिक सत्य की ओर प्रवाहित होते हैं।
यह ग्रंथ बताता है कि सत्यकाशी कोई साधारण नगर-कल्पना नहीं, बल्कि ब्रह्माण्डीय एकात्म बुद्धि से निर्मित वह दिव्य सभ्यतामूलक केन्द्र है जहाँ मानव जीवन का प्रत्येक पक्ष-आध्यात्मिक अनुभव, ज्ञान, रचनात्मकता, शिक्षा, संस्कृति, सामाजिक संगठन, पारदर्शी शासन, मानवीय एकता और ब्रह्माण्डीय विज्ञान-सत्य-सिद्धान्त के अंतर्गत सुसंगठित रूप से विकसित होता है। यहाँ विश्वशास्त्र मन्दिर, ब्रह्माण्डीय एकात्म विज्ञान विश्वविद्यालय (SUISU), विश्वधर्म उपासना स्थल, सत्य-धर्म-ज्ञान केन्द्र, दिव्य प्रकाश-नगर, सप्त-लोकों व अवतार परंपरा का साक्ष्य आधारित अध्ययन, और मानवता को स्वर्णयुग की ओर ले जाने हेतु अनेक परियोजनाएँ-सब मिलकर एक ही उद्देश्य की पूर्ति करती हैं: मनुष्य को “जानने” के मार्ग पर स्थापित करना, न कि केवल “मानने” के बोझ में दबाना।
सत्यकाशी, स्वर्णयुग का यह तीर्थ, इस पुस्तक में एक ऐसा जीवंत भविष्य प्रस्तुत करता है जो केवल कल्पना नहीं, बल्कि शास्त्रीय आधारों, ऐतिहासिक संकेतों, प्रत्यक्ष अनुभवों और दैवी समय-क्रम के संयोग से निर्मित हुआ है-जहाँ मनुष्य अपनी आत्मा की पूर्ण जागृति के साथ विश्वमानव बनकर उभरता है, और पृथ्वी एक ऐसे समाज की ओर बढ़ती है जिसमें सबके लिए एक समान ज्ञान, एक समान धर्मतत्व, एक समान मानव-मूल्य और एक समान ब्रह्माण्डीय चेतना का अनुभव संभव हो सके।
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