वैश्विक बुद्ध” कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि वह चेतना है जो समस्त मानवता के भीतर प्रस्फुटित होने वाली है-वह चेतना जो बुद्ध के करुणा-मार्ग, वेदों की एकात्म-भावना, उपनिषदों के ज्ञान-मार्ग, गीता के कर्म-योग, और आधुनिक विज्ञान के सार्वभौमिक नियमों को एक ही सूत्र में पिरोती है। यह पुस्तक इस चेतना के विकास को ऐतिहासिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक संदर्भों में समझाती है और बताती है कि अंतिम अवतार का अर्थ किसी दैहिक हस्तक्षेप से नहीं, बल्कि इस वैश्विक चेतना के परिपूर्ण और मूर्त रूप से है।
“वैश्विक बुद्ध” का अंतिम भाग पाठक को एक ऐसे भविष्य की ओर ले जाता है जहाँ मानवता न केवल बाहरी दुनिया में, बल्कि अपनी आन्तरिक चेतना में भी एक बड़े रूपांतरण से गुजर रही है। यह ग्रंथ बताता है कि अंतिम अवतार का अर्थ किसी एक युगांतकारी घटना से नहीं, बल्कि उस सामूहिक चेतना-जागरण से है जिसके बाद मनुष्य स्वयं को, समाज को और ब्रह्माण्ड को एक नई दृष्टि से देखना सीख जाएगा।
इस प्रकार यह पुस्तक केवल आध्यात्मिक या धार्मिक विचारों का संग्रह नहीं है; यह मनुष्य के सम्पूर्ण विकास की कथा है-अतीत की, वर्तमान की और उस भविष्य की जिसे मानवता शीघ्र ही अनुभव करने वाली है। यही इस ग्रंथ का उद्देश्य है-दिखाना कि “बुद्ध” एक इतिहास नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है; “अवतार” एक घटना नहीं, बल्कि चेतना का उत्कर्ष है; और “अंतिम जागरण” कोई अंत नहीं, बल्कि एक नए वैश्विक युग की शुरुआत है।
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