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RIshi, RIshi Parampara aur kalki mahavatar / ऋषि, ऋषि परम्परा और कल्कि महावतार

Author Name: Lava Kush Singh "vishwmanav" | Format: Paperback | Genre : Educational & Professional | Other Details

वेदों के मूल रचयिता भी ऋषि ही थे, और उपनिषदों के अनुभवी मनीषी भी वही। इस प्रकार, भारतीय ज्ञान-परम्परा वास्तव में ऋषि-परम्परा ही रही है-एक ऐसी अप्रतिहत धारा, जो सहस्राब्दियों से मानव की चेतना को सत्य और स्वात्मा की दिशा में अग्रसर करती रही है । पुस्तक स्पष्ट करता है कि ऋषि केवल आकाश में ही नहीं, बल्कि अन्तरिक्ष और मानव-शरीर-दोनों में विद्यमान हैं। इसका अर्थ है कि ऋषि का अस्तित्व केवल बाहरी दुनिया में ही नहीं, बल्कि प्रत्येक मनुष्य की आंतरिक क्षमता और उसके ‘कपाल’ में भी निहित है-यही वह प्रतीकात्मक बिंदु है जहाँ ज्ञान, ध्यान और अनुभूति एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं।
इस ग्रंथ की सार्थकता इसी में है कि यह ऋषियों, वेद-उपनिषदों, और कल्कि-अवतार के प्रकटार्थ को एक-दूसरे से पृथक नहीं मानता; बल्कि उन्हें एक अंतर्निहित विकास-यात्रा-एक दीर्घ चेतना-धारा-का क्रमिक unfolding मानता है। पाठक जब इस ग्रंथ में आगे बढ़ेगा, तो वह पाएगा कि ऋषियों का ज्ञान केवल अतीत की बात नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए प्रासंगिक है। और कल्कि अवतार का प्राकट्य भी किसी मिथकीय घटना की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि मनुष्य की सामूहिक चेतना की पराकाष्ठा है-यानी वह बिंदु जहाँ युग स्वयं को पुनर्गठित करता है।
 इस प्रकार, यह पुस्तक केवल ऐतिहासिक अथवा पौराणिक विवरण न होकर मानवता की चेतना-यात्रा का एक समग्र दार्शनिक आख्यान है-जहाँ ऋषि, ऋषि-परम्परा, वेद, उपनिषद, युग, काल और अवतार-सभी एक ही सत्य की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं।

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लव कुश सिंह “विश्वमानव”

कल्कि महाअवतार के रूप में स्वयं को प्रकट करते श्री लव कुश सिंह “विश्वमानव” द्वारा प्रकटीकृत ज्ञान-कर्मज्ञान न तो किसी के मार्गदर्शन से है और न ही शैक्षिक विषय के रूप में उनका विषय रहा है। न तो वे किसी पद पर कभी सेवारत रहे, न ही किसी राजनीतिक-धार्मिक संस्था के सदस्य रहे। एक नागरिक का अपने विश्व-राष्ट्र के प्रति कत्र्तव्य के वे सर्वोच्च उदाहरण हैं। साथ ही राष्ट्रीय बौद्धिक क्षमता के प्रतीक हैं।

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