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Kadava Jeevan, Kadave Chhand / कड़वा जीवन, कड़वे छंद

Author Name: Abhishek Kumar | Format: Paperback | Genre : Poetry | Other Details

“कड़वा जीवन, कड़वे छंद” समाज के सामने रखा गया एक आईना है। इसकी पंक्तियाँ मौन, लैंगिक विषमता और अंधानुकरण को भेदकर असुविधाजनक सत्यों से सामना कराती हैं।

कुछ रचनाएँ निजी अनुभवों से उपजी हैं, तो कुछ सामाजिक प्रश्नों को उजागर करती हैं। परंपरा और परिवर्तन का तनाव बार-बार उभरता है। 'ग्राम-स्मृति' और 'गाँव ढूँढ रहा था' गाँव की मासूमियत की याद दिलाती हैं, जबकि 'शुभ तिलक', 'छद्म व्यापार' और 'संस्कार के ठेकेदार' दहेज, पितृसत्ता और दोहरे मानदंडों पर प्रहार करती हैं।

'कलम नहीं चिंगारी' शोषण के विरुद्ध सत्य का साहस दिखाती है, और 'हिंसा करने में खोट नहीं' अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की अनिवार्यता को स्पष्ट करती है।

'पुरुष' कविता लैंगिकता और पहचान की पड़ताल करते हुए विशेषाधिकार और मौन पीड़ाओं दोनों को रेखांकित करती है।

'सौदा नहीं किया' और 'मैं और मेरा अंदाज़' सिद्धांतों पर अडिग रहने का स्वर हैं।

'खोने की कसक' और 'मेरे जाने के बाद' शोक को, जबकि 'छठ महापर्व' और 'बारात की एक झलक' सांस्कृतिक रंगों को प्रस्तुत करती हैं। 'कृष्ण की प्रतीक्षा' पौराणिक प्रतीकों के माध्यम से समकालीन न्याय की मांग करती है।

यह संकलन सामाजिक टिप्पणी, सांस्कृतिक स्मृति और व्यक्तिगत दर्शन का संगम है - निडर, संवेदनशील और लयात्मक। यह उन सभी के लिए है जो साहित्य को विचार और परिवर्तन की चिंगारी मानते हैं।

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अभिषेक कुमार

उनका जन्म ग्रामीण परिवेश में हुआ, जहाँ समाज की असमानताएँ और शिक्षा की सीमाएँ उन्होंने निकट से देखीं। गाँव में आरंभिक शिक्षा के बाद 2002 में जेएनवीएसटी उत्तीर्ण कर उन्होंने जवाहर नवोदय विद्यालय, औरंगाबाद में अध्ययन किया। आगे इग्नू से हिंदी, इतिहास, राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र और अंग्रेज़ी में स्नातक व स्नातकोत्तर किया।

ग्रामीण अनुभव ही उनके लेखन की नींव बने।

उनके शब्दों में— “काव्य-रचना तुकबंदी नहीं, समाज की पीड़ा को शब्दों में बदलने और जनता को जगाने का एक सशक्त माध्यम है।”

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