*नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे* लेखक डॉ. रवीन्द्र पस्तोर द्वारा रचित एक गहन, विचारोत्तेजक और आत्ममंथन कर देने वाली कृति है, जो भारत को केवल एक राष्ट्र या भौगोलिक संरचना के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत, जागृत और शाश्वत चेतना के रूप में प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक आधुनिक युवक आर्य की वैचारिक यात्रा के माध्यम से पाठक को सिलिकॉन वैली की तकनीकी चकाचौंध से भारत की सनातन जड़ों तक ले जाती है, जहाँ विज्ञान, अध्यात्म, दर्शन और राष्ट्रबोध आपस में संवाद करते हैं। लेखक इस कृति में यह स्पष्ट करते हैं कि भारत की आत्मा अंधविश्वास या भावुकता में नहीं, बल्कि तर्क, शोध, अनुभव और विवेक में निहित है। नासदीय सूक्त और बिग बैंग थ्योरी, उपनिषदों और आधुनिक चेतना विज्ञान, गीता और कर्म के मनोविज्ञान के माध्यम से यह पुस्तक प्राचीन सनातन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच एक सशक्त सेतु का निर्माण करती है। उज्जैन, काशी, ऋषिकेश, कन्याकुमारी, अयोध्या और कुरुक्षेत्र जैसे सांस्कृतिक केंद्रों की यात्रा करते हुए पाठक यह समझ पाता है कि धर्म मर्यादा है, शक्ति अनुशासन है और राष्ट्र निर्माण सत्ता का विस्तार नहीं बल्कि मानवता के प्रति उत्तरदायित्व है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए है जो भारत को केवल मानने नहीं, समझना चाहते हैं; जो विज्ञान और अध्यात्म के संतुलन की खोज में हैं; और जो अपने अहं को राष्ट्र की विराट चेतना में विलीन करने का साहस रखते हैं। नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक संवाद, एक साधना और स्वयं से राष्ट्र तक की यात्रा है।
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