मुख्य कथा के साथ अनेक उप कथाओं को साथ लिए बहती हुई इस काव्य धारा को ‘खंड -काव्य’ कहना ही अति उचित होगा; जिसका रोमांचक पक्ष है कवयित्री द्वारा कल्पना की उड़ान का पारसत्व भाव ; जो दुर्योधन् जैसे भ्रष्ट चरित्र को सोना-सोना कर जाने को अधीर हो उठा है। जैसे—उसके नए आवरण में कसने को कहे गए वाक्य ---उसके हृदय में भी अपने पूर्वजों द्वारा किये गए अनाचार की व्यथा है । इसकी पुष्टि में कवयित्री श्री कृष्ण से भी कहलवा गई हैं, हे कुरुराज / जो मौत तुम्हें तुझे मिल रही है / वह युधिष्ठिर अर्जुन भी न पायेंगे । साहित्य में शील निरूपण का यह उपक्रम नया नहीं है। इतिहास में कभी श्री महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की “उर्मिला विषयक उदासीनता” निबंध ने भी हलचल मचाई थी । फलस्वरूप उपेक्षिता उर्मिला पर साहित्य लिखने वाले गुलों की बाढ़ सी हो आई । हो सकता है ,कभी किसी द्विवेदी जी का दिल इस पात्र के लिए भी धड़क उठे, जिसका आगाज रूपाजी ने कर दिया है ।
इस रचना के विषय के रूप में गंगा का धरती पर आने का कारण, सत्यवती की उत्पत्ति, राजा शांतनु से विवाह, द्रौपदी के पूर्व जन्म की कथा, द्रौपदी का वस्त्र हरण नहीं कर पाने का कारण कृष्ण नहीं, स्वयं धर्मराज ही थे, धृतराष्ट्र का जन्मांध होने का कारण, कर्ण अर्जुन के प्रतिद्वंद्विता का कारण, भीष्म और अष्ट वसुओं की कथा, गांधारी आँख रहते भी क्यों अपने सौ पुत्रों का मुख नहीं देख पाई, इत्यादि विषय को कारण सहित प्रकाश में लाने का प्रयास है । अभिमन्यु का वध कृष्ण के होने के बावजूद भी क्यों हुआ? भीम के पौत्र बर्बरीक का कृष्ण के हाथों वध ,इन सारी ही घटनाओं का वर्णन यहाँ कृष्ण ने दुर्योधन के प्रश्न के उत्तर स्वरूप दिया है । अर्जुन कृष्ण का भक्त था, कर्ण भी कृष्ण का भक्त था, फिर भी कृष्ण सदा अर्जुन के ही साथ रहते थे – क्यों ?